Bansgaon Sandesh
Login
T
Lucknowलगभग १ घंटा पहले

लखनऊ लखनऊ में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस कार्यक्रम में माननीय मुख्यमंत्री

लखनऊ लखनऊ में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस कार्यक्रम में माननीय मुख्यमंत्री

लखनऊ लखनऊ में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस कार्यक्रम में माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का संबोधन आज पूरा देश विभाजन के भीषण त्रासदी के स्मृति दिवस के साथ जुड़ा है,यह विश्व मानवता इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। करोड़ो हिंदुओ को अपने ही मातृभूमि ,जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ा था,लाखो की संख्या में हिंदू बौद्ध सिख जैनी का कत्लेआम हुआ था, किसी भी स्तर पर कोई सुनवाई नही थी। सुनने सम्वेदना की बात तो दूर सत्ता प्राप्त होंने की लिप्सा इस हद तक थी कि एक सनातन राष्ट्र के टुकड़े कर दिए गए। यह दिवस इतिहास के उन काले अध्यायों से हमें बहुत कुछ सीखने की एक प्रेरणा भी प्रदान कर रहा है, क्योंकि यह केवल उसका स्मरण भर मात्र करने भर से इसकी समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। यह समस्या क्यों पैदा हुई, किन लोगों के कारण पैदा हुई, इसके कितने दोषियों को सजा दी गई और आखिर कब तक यह हिंदुस्तान इसकी कीमत चुकाता रहेगा? यह प्रश्न आज भी हम सबके सामने उसी मजबूती के साथ खड़े हुए हैं, और इसलिए इतिहास केवल परीक्षा का एक पाठ्यक्रम नहीं होता है, इतिहास गौरवशाली क्षणों पर गर्व की अनुभूति करने और अतीत की गलतियों को परिमार्जन करने का एक अवसर भी हमें देता है,और स्मृति दिवस के पीछे का भाव भी आदरणीय प्रधानमंत्री जी का यही रहा है। जो लोग 1947 में मौन थे, जिनके स्वर नही फूट रहे थे, उनकी नजरें सत्ता पर थीं, देश की कीमत पर सत्ता मिले, उन लोगो के कृत्य आज भी वही हैं। आपने बांग्लादेश में हिंदुओं का कत्लेआम देखा होगा,ये दल तब भी मौन थे, अगर ये कोई प्रतिक्रिया करते तो उन्हें लगता था कि उनका वोटबैंक खिसक न जाये। ये लोग तब भी मौन थे,आगे भी मौन रहने वाले हैं,क्योंकि ये अपने निहित स्वार्थ मानकर सत्ता को पर्सनल प्रॉपर्टी बनाकर सत्ता को पारिवारिक विरासत बनाकर देश के साथ धोखा करने वाले हैं, यही करके ये अराजकता अव्यवस्था फैलाते हैं। आज पूरा देश विभाजन के भीषण त्रासदी के स्मृति दिवस के साथ जुड़ा है,यह विश्व मानवता इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। करोड़ो हिंदुओ को अपने ही मातृभूमि ,जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ा था,लाखो की संख्या में हिंदू बौद्ध सिख जैनी का कत्लेआम हुआ था, किसी भी स्तर पर कोई सुनवाई नही थी। सुनने सम्वेदना की बात तो दूर सत्ता प्राप्त होंने की लिप्सा इस हद तक थी कि एक सनातन राष्ट्र के टुकड़े कर दिए गए।

0 likes
0 comments0 shares