"किसान यूनियन के एजेंडे से बाहर हुए गोवंश, गौशालाओं की बदहाली पर कौन उठाएगा आवाज"

"किसान यूनियन के एजेंडे से बाहर हुए गोवंश, गौशालाओं की बदहाली पर कौन उठाएगा आवाज" फतेहपुर। बिजली, पानी, सड़क, खाद और बीज जैसी समस्याओं को लेकर किसान यूनियन हमेशा सरकार और प्रशासन के खिलाफ मुखर होकर आंदोलन करती नजर आती है। किसानों के हितों से जुड़े तमाम मुद्दों को उठाने वाली यूनियन उन विषयों पर भी संघर्ष करती रही है, जिन पर कई बार विपक्षी दल भी चुप्पी साध लेते हैं। लेकिन एक ऐसा मुद्दा है, जो अब किसान यूनियन के एजेंडे से लगभग गायब होता दिखाई दे रहा है। यह मुद्दा है गोवंश और गौशालाओं की बदहाल स्थिति का। कभी किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करने वाले गोवंश आज उपेक्षा का शिकार हैं। आधुनिक मशीनों के दौर में भले ही बैलों की उपयोगिता कम हुई हो, लेकिन किसानों और गोवंश का रिश्ता केवल खेती तक सीमित नहीं रहा है। दूध उत्पादन से लेकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक में गोवंश की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके बावजूद सड़कों पर घूम रहे आवारा पशु हों या गौशालाओं में रह रहे गोवंश, उनकी स्थिति गर्मी और बरसात दोनों मौसमों में चिंताजनक बनी हुई है। जनपद में किसान यूनियन का मजबूत प्रभाव माना जाता है। यूनियन कई बार आवारा पशुओं से फसलों को होने वाले नुकसान का मुद्दा उठाकर प्रशासन को घेर चुकी है। लेकिन गौशालाओं की वास्तविक स्थिति को लेकर कभी कोई बड़ा अभियान या आंदोलन देखने को नहीं मिला। यदि किसान संगठन गौशालाओं का निरीक्षण करें तो उन्हें यह भी दिखाई देगा कि कई स्थानों पर न तो पर्याप्त वृक्षारोपण किया गया है और न ही पशुओं के लिए समुचित छांव की व्यवस्था है। हरे चारे और अन्य आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता भी कई जगह सवालों के घेरे में है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर वर्ष लाखों पौधों के वृक्षारोपण के दावे किए जाते हैं, तो गौशालाओं को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती? आखिर चिलचिलाती धूप और बरसात के दौरान गोवंशों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित क्यों रहना पड़ता है? यह विषय केवल प्रशासन या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज और किसान संगठनों की भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। राजनीतिक दल और नेता चुनावी मंचों पर गोवंश संरक्षण की बात कर सत्ता तक पहुंच जाते हैं, लेकिन बाद में उनकी जिम्मेदारियां कहीं पीछे छूट जाती हैं। ऐसे में उम्मीद किसान यूनियनों से ही बचती है कि वे किसानों के साथ-साथ गोवंशों और गौशालाओं की समस्याओं को भी अपने प्रमुख एजेंडे में शामिल करें। यदि किसान संगठन इस दिशा में पहल करें तो गौशालाओं की तस्वीर बदल सकती है और गोवंशों को बेहतर जीवन मिल सकता है।