लखनऊ में सड़कों पर दौड़ीं 'गदर' वाली विंटेज कारें, 500 से ज्यादा

लखनऊ में सड़कों पर दौड़ीं 'गदर' वाली विंटेज कारें, 500 से ज्यादा महिलाओं ने निकाली 'पिंक वेव रैली' *लखनऊ, 4 अक्टूबर।* राजधानी लखनऊ में रविवार को ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ जागरूकता के लिए SGPGI की ओर से 'पिंक वेव-2026' वॉकथॉन का आयोजन किया गया। इस दौरान 500 से ज्यादा महिलाओं ने पिंक ड्रेस में रैली निकाली। यह रैली वीमेन पावर लाइन 1090 चौराहे से शुरू होकर फूड वैली, समता मूलक चौराहा होते हुए वापस 1090 चौराहे पर समाप्त हुई। रैली में महिलाओं के साथ छात्राएं, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक भी शामिल हुए। सभी ने पिंक टी-शर्ट, पिंक कैप और पिंक रिबन लगाया हुआ था। *चमचमाती विंटेज कारों पर टिकी रहीं निगाहें* इस खास मौके पर विंटेज कार रैली भी निकाली गई। एक दर्जन से अधिक विंटेज कारें 'Drive the Message Through Lucknow' के संदेश के साथ सड़कों पर दौड़ीं। इनमें सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र रही अमरीश पुरी की फिल्म 'गदर' में इस्तेमाल हुई कार। चमचमाती विंटेज कारों को देखकर वहां मौजूद बच्चे और बड़े सभी सेल्फी लेते नजर आए। छात्र इन गाड़ियों के बारे में मालिकों से जानकारी लेते रहे। *पिताजी ने 21वें बर्थडे पर गिफ्ट की थी कार* विंटेज कार रैली में आए केशव माथुर ने बताया- मैं शेवरोलेट मास्टर डीलक्स कार के साथ रैली में शामिल हुआ हूं। यह कार मेरे पिताजी ने मेरे 21वें बर्थडे पर गिफ्ट की थी। पिताजी ने इसे राजा सलीमपुर से खरीदा था। यह 1939 मॉडल की कार है। लोग इसे देखकर हैरान रह जाते हैं। यह वही कार है जिसे गदर फिल्म की शूटिंग में अमरीश पुरी ने इस्तेमाल किया था। *लंदन से मंगवाने पड़ते हैं पार्ट्स* रैली में 1951 की मॉरिस ब्रिटिश कार लेकर पहुंचे नितिन ने बताया- यह लगभग 75 साल पुरानी गाड़ी है। इसे मेंटेन रखना बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है। घर के बड़े-बुजुर्ग की तरह इसकी देखभाल करनी पड़ती है। सबसे बड़ी दिक्कत इसके पार्ट्स की है, जो इंडिया में मिलते ही नहीं। हमारे एक निजी मैकेनिक हैं जो परमानेंट इसकी देखभाल करते हैं। हर हफ्ते इसे स्टार्ट करना और चेक करना रूटीन है। अगर कोई जरूरी पार्ट यहां नहीं बन सकता तो उसे लंदन से मंगवाना पड़ता है। *कैंसर में रेगुलर जांच जरूरी* कार्यक्रम में SGPGI के विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में स्तन कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर है। समय पर पहचान होने पर 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में इसका सफल इलाज संभव है। विशेषज्ञों ने रेगुलर जांच और सेल्फ एग्जामिनेशन पर जोर दिया और कहा कि 40 साल की उम्र के बाद नियमित मैमोग्राफी जांच बेहद जरूरी है।