*5 लाख का सामुदायिक शौचालय बना शोपीस! न पानी, न सफाई, न

*5 लाख का सामुदायिक शौचालय बना शोपीस! न पानी, न सफाई, न मोटर—दो साल से मानदेय न मिलने का भी आरोप* नेक्स्ट अपडेट न्यूज़ बेलघाट/गोरखपुर। विकासखंड बेलघाट के त्रिलोकपुर गांव में स्वच्छता अभियान के तहत करीब पांच लाख रुपये की लागत से बने सामुदायिक शौचालय की बदहाली का मामला सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद शौचालय का नियमित संचालन नहीं हो रहा है। कहीं मोटर नहीं है तो कहीं पानी, साबुन और बाल्टी जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में सामुदायिक शौचालय ग्रामीणों के लिए सुविधा के बजाय शोपीस बनकर रह गया है। सामुदायिक शौचालय की केयरटेकर जमावती देवी पत्नी राजमन ने बताया कि शौचालय में पाइप, मोटर, वाइपर, बाल्टी और साबुन जैसी जरूरी व्यवस्थाएं नहीं हैं। उनका दावा है कि सफाई और दवा के छिड़काव के लिए वह अपने पैसे से बाल्टी, झाड़ू और दवा खरीदती हैं। केयरटेकर ने आरोप लगाया कि शौचालय का मोटर ग्राम प्रधान उठा ले गए हैं। साथ ही उन्होंने करीब दो वर्षों से मानदेय नहीं मिलने का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि मामले की जानकारी उच्च अधिकारियों को दी गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं गांव के रामफल निषाद, रीना, श्रीमती, सुदामी और कवली समेत अन्य ग्रामीणों ने बताया कि सामुदायिक शौचालय अक्सर बंद रहता है। कभी खुलता भी है तो वहां पानी, बाल्टी और साबुन की व्यवस्था नहीं होती। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकारी धन से शौचालय का निर्माण कराया गया है तो उसका नियमित संचालन और जरूरी सुविधाएं भी सुनिश्चित होनी चाहिए। प्रधान ने आरोपों को बताया गलत मामले में ग्राम प्रधान राजेश जायसवाल ने अलग पक्ष रखा। प्रधान का कहना है कि शौचालय का मोटर खराब हो गया था, जिसे मरम्मत के लिए मैकेनिक के पास भेजा गया है। मरम्मत पूरी होने के बाद मोटर को दोबारा शौचालय में लगा दिया जाएगा। प्रधान ने केयरटेकर के मानदेय को लेकर भी अलग दावा किया। उनका कहना है कि केयरटेकर की नियुक्ति एक वर्ष के लिए हुई थी और उनका भुगतान किया जा चुका है। प्रधान के मुताबिक जमावती देवी पंचायत सदस्य भी हैं और केयरटेकर के रूप में उनकी नियुक्ति तथा भुगतान को लेकर भी सवाल उठते हैं। प्रधान ने आरोप लगाया कि जमावती देवी पंचायत सदस्य का मानदेय लेने के साथ-साथ केयरटेकर का पैसा भी अपने खाते में ले रही हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ग्रामीणों के साथ उनके व्यवहार के कारण लोग सामुदायिक शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते और अधिकांश समय शौचालय पर ताला लगा रहता है। हालांकि, केयरटेकर और ग्राम प्रधान द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। अब सवाल यह है कि करीब पांच लाख रुपये की लागत से बना सामुदायिक शौचालय आखिर नियमित रूप से क्यों नहीं चल रहा? दो साल से मानदेय नहीं मिलने के दावे और प्रधान द्वारा भुगतान किए जाने के दावे में सच्चाई क्या है? इसकी निष्पक्ष जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। ग्रामीणों ने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कराकर सामुदायिक शौचालय को नियमित रूप से संचालित कराने और पानी, सफाई, साबुन व अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।