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सुलतानपुर में CM योगी के आदेश बेअसर! आपूर्ति कार्यालय बना प्राइवेट कर्मियों

सुलतानपुर में CM योगी के आदेश बेअसर! आपूर्ति कार्यालय बना प्राइवेट कर्मियों का 'पावर सेंटर' *सरकारी फाइलों पर बाहरी हाथ, जिम्मेदार मौन; सप्लाई इंस्पेक्टर और DSO की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल* सुलतानपुर। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति और सरकारी कार्यालयों में बाहरी व्यक्तियों की तैनाती पर सख्त प्रतिबंध के बावजूद सुलतानपुर का जिला आपूर्ति कार्यालय नियम-कानूनों को खुली चुनौती देता नजर आ रहा है। सदर तहसील परिसर स्थित कार्यालय में सरकारी कार्यों का संचालन कथित रूप से प्राइवेट व्यक्तियों के भरोसे किया जा रहा है, जिससे सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और गोपनीयता दोनों पर सवाल खड़े हो गए हैं। *सरकारी कुर्सी पर प्राइवेट कब्जा* सूत्रों के अनुसार कार्यालय में राशन कार्डों की प्रक्रिया, लाभार्थियों के रिकॉर्ड और महत्वपूर्ण दस्तावेजों से जुड़ा कार्य प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटरों द्वारा किया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कुड़वार ब्लॉक जैसे महत्वपूर्ण हल्के की जिम्मेदारी भी कथित तौर पर एक निजी व्यक्ति को सौंप दी गई है। क्या शासनादेश सिर्फ कागजों तक सीमित? प्रदेश सरकार के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी सरकारी कार्यालय में बाहरी व्यक्ति से सरकारी कार्य नहीं लिया जाएगा। इसके बावजूद यदि संवेदनशील अभिलेख और सरकारी डाटा निजी हाथों में हैं तो यह न केवल शासनादेश की अवहेलना है, बल्कि सरकारी गोपनीयता और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। *सवालों से बचते नजर आए जिम्मेदार* जब इस पूरे मामले में जिम्मेदार से पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। जिम्मेदार अधिकारी की यह चुप्पी मामले को और अधिक संदिग्ध बना रही है। जनता पूछ रही है... ● आखिर किसके आदेश पर दर्जन भर प्राइवेट व्यक्ति को सरकारी कार्यालय में बैठाकर कार्य कराया जा रहा है? ● कुड़वार ब्लॉक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र का कार्यभार किसी बाहरी व्यक्ति को किस नियम के तहत सौंपा गया? ● क्या जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) को इसकी जानकारी है या सब कुछ उनकी निगरानी में हो रहा है? ● सरकारी रिकॉर्ड और लाभार्थियों की जानकारी प्राइवेट हाथों में सौंपना क्या नियमों का खुला उल्लंघन नहीं है? प्रशासन कब लेगा संज्ञान? यदि आरोप सही हैं तो यह मामला सिर्फ विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और उच्चाधिकारी इस गंभीर प्रकरण की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है— जब मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन कराने वाले ही नियमों को दरकिनार कर दें, तो जवाबदेही किससे मांगी जाए?

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