’प्रतिबंधित चाइनीज मांझे से गर्दन कटने पर युवक की मौत सवालों के
’प्रतिबंधित चाइनीज मांझे से गर्दन कटने पर युवक की मौत सवालों के घेरे में गोरखपुर पुलिस का 'सिंडिकेट प्रेम', चौकी इंचार्ज सस्पेंड कर 48 घंटे के 'अभियान' का नया नाटक गोरखपुर। शहर में अवैध रूप से बिक रहे जानलेवा चाइनीज मांझे ने आज फिर एक निर्दोष की जान ले ली। तिवारीपुर थाना क्षेत्र के इलाहीबाग बंधे पर सूरजकुंड निवासी 35 वर्षीय रमेश कन्नौजिया की गर्दन कटने से हुई दर्दनाक मौत ने पुलिस प्रशासन के दावों की कलई खोलकर रख दी है। घटना के बाद लीपापोती की पुरानी स्क्रिप्ट पर चलते हुए पुलिस ने चौकी प्रभारी को सस्पेंड कर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन असल सवाल जस का तस है कि शहर में मौत का यह धागा सप्लाई करने वाले बड़े माफियाओं पर हाथ डालने की हिम्मत पुलिस कब जुटाएगी? गर्दन कटी तो जागी खाकी, चौकी इंचार्ज पर गिरी गाज, 48 घंटे का 'अल्टीमेटम ' हादसे के बाद उठे भारी जनआक्रोश को शांत करने के लिए पुलिस अधीक्षक नगर निमिष पाटिल ने आनन-फानन में बयान जारी किया। उन्होंने बताया कि मामले में सुसंगत धाराओं, विशेषकर गैर-इरादतन हत्या की धारा के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। लापरवाही बरतने के आरोप में स्थानीय चौकी प्रभारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। एसपी सिटी ने यह भी दावा किया कि प्रतिबंधित मांझे की अवैध बिक्री पर लगाम लगाने के लिए आगामी 48 घंटों का एक विशेष सघन अभियान शुरू किया जा रहा है, जिसमें अवैध कारोबारियों के खिलाफ बेहद सख्त कार्रवाई की जाएगी। कागजों में 48 घंटे का अल्टीमेटम भले ही कड़ा लगे, लेकिन हकीकत यह है कि गोरखपुर पुलिस का यह रवैया पुराना है। जब भी चाइनीज मांझे से किसी का गला कटता है या कोई लहूलुहान होता है, महकमा चंद घंटों के लिए नींद से जागता है और पुलिस टीमें तंग गलियों में निकलती हैं फिर फुटकर दुकानदारों से दो-चार चरखी या रील मांझा बरामद कर अखबारों में फोटो खिंचवा लेती हैं। हफ्ता भर बीतते ही 'सघन अभियान' फाइलों में दफन हो जाता है और पतंग की दुकानों से लेकर गुमटियों तक मौत का यह सामान फिर खुलेआम बिकने लगता है। हर बार की तरह इस बार भी बड़े नेटवर्क को छूने के बजाय सारा ठीकरा स्थानीय चौकी प्रभारी के सिर फोड़कर सस्पेंड कर दिया गया, ताकि उच्चाधिकारियों की जवाबदेही पर पर्दा डाला जा सके। हाईटेक खुफिया तंत्र फेल या रसूखदार डीलरों को 'अभयदान'? सबसे बड़ा सवाल गोरखपुर पुलिस की कार्यशैली और उसके बहुचर्चित 'मजबूत खुफिया तंत्र' पर उठता है। शहर में परिंदा भी पर मारे तो जानकारी रखने का दावा करने वाली पुलिस को आज तक यह भनक क्यों नहीं लगी कि ट्रकों और गाड़ियों में भरकर यह सिंथेटिक मांझा आखिर किस रास्ते गोरखपुर पहुंच रहा है? शहर की थोक मंडियों, गोदामों और ट्रांसपोर्ट नगर से होकर गुजरने वाले इस सिंडिकेट के असली सरगना आज तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। क्या पुलिस का खुफिया नेटवर्क वाकई इतना लाचार है कि वह थोक सप्लायरों का पता नहीं लगा पाता, या फिर इस खूनी कारोबार के पीछे कोई संगठित सांठगांठ काम कर रही है? जब तक पुलिस फुटकर विक्रेताओं से आगे बढ़कर सिंडिकेट के मुख्य आकाओं की कमर नहीं तोड़ेगी, तब तक 48 घंटे के ऐसे दिखावटी अभियान महज खानापूर्ति ही साबित होंगे और सड़कों पर आम जनता का खून यूं ही बहता रहेगा।