टोंस नदी पर ‘खनन सिंडिकेट’ का कब्जा! करछना में बेखौफ खेल, सिस्टम

टोंस नदी पर ‘खनन सिंडिकेट’ का कब्जा! करछना में बेखौफ खेल, सिस्टम पर सीधे सवाल धरवाराघाट से साहपुर तक नामजद चेहरे बेनकाब—मिलीभगत, वसूली और धमकियों से दहशत में गांव प्रयागराज। करछना तहसील क्षेत्र में अवैध खनन अब छिपा हुआ अपराध नहीं रहा। टोंस नदी के धरवाराघाट पर बिना वैध पट्टे के जेसीबी और ट्रैक्टरों से बालू की निकासी दिन-दहाड़े जारी है। प्रशासनिक तंत्र की मौजूदगी में यह सब हो रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर शून्य स्थिति ने मिलीभगत के आरोपों को बल दे दिया है। ग्रामीणों के अनुसार यह अलग-थलग घटना नहीं बल्कि संगठित खनन सिंडिकेट का हिस्सा है, जो धरवाराघाट से लेकर धरवारा , साहपुर, सुलमई, इसैटा और झरियही तक फैला हुआ है। बेनकाब हुए नामजद चेहरे स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस पूरे नेटवर्क में बृजेश सिंह उर्फ चंदन, विजय प्रताप सिंह उर्फ मोहन सिंह, संजय निषाद, राम सिंह, गोरेलाल उर्फ शुभम तिवारी जैसे नाम सामने आ रहे हैं। आरोप है कि ये लोग खुलेआम नदी से बालू निकाल रहे हैं और अपने प्रभाव के दम पर किसी भी कार्रवाई को रोकने में सफल हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि ट्रैक्टरों की लंबी कतारें सुबह से देर रात तक लगी रहती हैं। बालू के ट्रक सीधे मुख्य मार्गों पर निकलते हैं और कई बार तो रात में भी अवैध खनन होता है। पर्यावरण और आजीविका पर संकट टोंस नदी के किनारे लगातार कट रहे हैं। लगातार खनन से नदी का जलस्तर तेजी से गिर रहा है और तटीय क्षेत्र की जमीन कमजोर हो रही है। खेती योग्य भूमि का कटाव बढ़ने से किसानों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है। नदी के प्राकृतिक बहाव में बदलाव आने से बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अंधाधुंध खनन से जलचर जीवों का अस्तित्व खतरे में है और भूजल स्तर में भी गिरावट आ रही है। ग्रामीण बताते हैं कि पहले टोंस नदी के किनारे हरे-भरे पेड़ और खेत हुआ करते थे, लेकिन अब जगह-जगह गहरे गड्ढे बन गए हैं। बरसात के मौसम में इन गड्ढों में पानी भर जाता है, जिससे बच्चों और मवेशियों के लिए खतरा बढ़ गया है। कई बार मवेशी इन गड्ढों में फंसकर घायल हो चुके हैं। सिस्टम पर उठ रहे सवाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध खनन की जानकारी प्रशासन को क्यों नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि खनन विभाग और स्थानीय पुलिस की चुप्पी महज संयोग नहीं है। हर महीने मोटी रकम “सेटिंग” के नाम पर पहुंचने की बात कही जा रही है। इसी कारण न तो जेसीबी जब्त होती है और न ही ट्रैक्टरों पर कोई कार्रवाई होती है। स्थानीय लोगों ने बताया कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन मौके पर पहुंची टीम सिर्फ खानापूर्ति कर लौट आती है। कुछ घंटों के लिए खनन रुकता है और फिर पहले की तरह शुरू हो जाता है। इससे लोगों का विश्वास प्रशासन से उठता जा रहा है। डर और धमकियों का माहौल अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाने वाले ग्रामीणों को धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। कई लोगों का कहना है कि शिकायत करने पर उन्हें रात में घर से उठाकर मारपीट की जाती है। महिलाओं को भी धमकाया जाता है। कुछ ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके घरों के बाहर रात में अज्ञात लोग आकर पत्थर फेंकते हैं और परिवार को अंजाम भुगतने की धमकी देते हैं।यहां तक की किसी पत्रकार की गाड़ी में प्रेस का लोबो लगा है उन्हें भी रोक कर धमकाया जाता है उन्हे बेज्जत करने का प्रयास किया जाता है इस माहौल में अधिकांश लोग अब शिकायत करने से कतराते हैं। जो लोग साहस दिखाकर प्रशासन तक पहुंचते हैं, उनकी शिकायतों पर या तो देर से कार्रवाई होती है या फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। इससे पूरे इलाके में भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है। संगठित नेटवर्क की कार्यप्रणाली ग्रामीणों के अनुसार खनन सिंडिकेट की कार्यप्रणाली पूरी तरह संगठित है। धरवाराघाट पर जेसीबी से बालू निकालने के बाद उसे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में लादकर आसपास के गांवों में ले जाया जाता है। वहां से ट्रकों में भरकर इसे प्रयागराज और आसपास के निर्माण स्थलों पर सप्लाई किया जाता है। एक ट्रैक्टर ट्रॉली बालू की कीमत बाजार में 1500 से 2000 रुपये तक है, जबकि अवैध खनन से यह 800 से 1000 रुपये में उपलब्ध हो जाती है। यही कारण है कि निर्माण ठेकेदार भी इस सस्ते बालू को खरीदने में रुचि दिखाते हैं। सूत्रों के अनुसार सिंडिकेट ने नदी के किनारे कई अस्थायी रास्ते बना रखे हैं, ताकि प्रशासन की नजर से बचा जा सके। रात में जेसीबी की रोशनी में खनन होता है और सुबह होते-होते ट्रैक्टरों की आवाजाही शुरू हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सब कुछ स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। आर्थिक नुकसान और राजस्व की हानि सरकारी आंकड़ों के अनुसार अवैध खनन से राज्य सरकार को हर साल करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। करछना क्षेत्र में भी यही स्थिति है। वैध पट्टाधारकों को कारोबार में घाटा हो रहा है, क्योंकि अवैध बालू सस्ते दाम पर उपलब्ध होने से उनकी बिक्री घट गई है। इससे न सिर्फ सरकार का राजस्व कम हो रहा है बल्कि वैध खनन व्यवसाय भी प्रभावित हो रहा है। ग्रामीणों की मांग और प्रशासन की चुप्पी अब ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि नामजद आरोपियों की भूमिका की जांच होनी चाहिए और अवैध खनन के इस पूरे जाल को जड़ से खत्म किया जाना चाहिए। ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि नदी किनारे कटाव रोकने के लिए तटबंध बनाए जाएं और पर्यावरण संरक्षण के उपाय किए जाएं। हालांकि प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। तहसील स्तर के अधिकारियों का कहना है कि शिकायत मिलने पर जांच कराई जाएगी, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यह सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती है। कानून का राज या माफियाओं का दबदबा अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि करछना में कानून का राज है या खनन माफियाओं का दबदबा। ग्रामीणों का कहना है कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो स्थिति और बिगड़ सकती है। नदी का सीना लगातार छलनी हो रहा है और अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में पूरे क्षेत्र का पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ जाएगा। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह सिर्फ करछना का मामला नहीं है। प्रयागराज के कई अन्य ग्रामीण इलाकों में भी टोंस, यमुना और गंगा किनारे इसी तरह अवैध खन हो रहा है। लेकिन करछना का मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि यहां खन पूरी तरह संगठित हो चुका है और इसमें बाहरी तत्वों की भी संलिप्तता बताई जा रही है। राजनीतिक संरक्षण के आरोप कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि खनन सिंडिकेट को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। चुनाव के समय यही लोग नेताओं के लिए धन जुटाने का काम करते हैं, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन ग्रामीणों में इसको लेकर चर्चा तेज है। उच्चस्तरीय जांच की जरूरत सूत्रों से मिली जानकारी के अनुशार भाकियू भानू के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. बीके सिंह का मानना है कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए। तभी सच्चाई सामने आ सकेगी और दोषियों पर कार्रवाई हो सकेगी। साथ ही नदी किनारे रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस गश्त बढ़ाई जानी चाहिए, ताकि धमकियों का माहौल खत्म हो सके। प्रशासन के सामने चुनौती जिला प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर अवैध खनन को रोकना है तो दूसरी ओर ग्रामीणों का विश्वास बहाल करना है। अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो लोगों का आंदोलन तेज हो सकता है। पहले भी कई बार ग्रामीणों ने धरना-प्रदर्शन कर अवैध खनन रोकने की मांग की है, लेकिन परिणाम शून्य रहा है। अब भारतीय किसान यूनियन भानू के प्रदेश महामंत्री ठाकुर कृष्णराज सिंह बैस ने खुली चुनौती दी है प्रशासन खनन नही बन्द कराती है तो हम धरना पर बैठने के लिए मजबूर होगे जिसका जिम्मेदार शासन प्रशासन स्वयं होगा स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर अवैध खनन से न सिर्फ पर्यावरण बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। मछली पकड़ने वाले निषाद समुदाय के लोगों का कहना है कि नदी में मछलियों की संख्या घट गई है, जिससे उनकी रोजी-रोटी पर असर पड़ा है। खेती के लिए नदी का पानी भी कम हो गया है, जिससे फसल उत्पादन में गिरावट आई है। अब क्या होगा अब देखना यह है कि प्रशासन इस चुनौती को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या नामजद आरोपियों पर कार्रवाई होगी या फिर यह खेल यूं ही चलता रहेगा। ग्रामीणों की उम्मीदें अब जिला प्रशासन और उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो टोंस नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अब पीछे नहीं हटेंगे। अगर प्रशासन कार्रवाई नहीं करता तो वे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को तैयार हैं। उनका कहना है कि नदी केवल बालू का स्रोत नहीं है, बल्कि यह उनकी जीवनरेखा है और उसे बचाना उनकी जिम्मेदारी है।