नेक्स्ट अपडेट न्यूज़ देवरिया, देवरहा बाबा मंदिर के महंत बालमुकुंद दास का

नेक्स्ट अपडेट न्यूज़ देवरिया, देवरहा बाबा मंदिर के महंत बालमुकुंद दास का निधन, संत समाज में शोक की लहर, रिपोर्ट देवरिया देवरिया। भागलपुर स्थित प्रसिद्ध देवरहा बाबा मंदिर आश्रम के महंत एवं गुफा परिसर में स्थित राधा-कृष्ण और हनुमान मंदिर के महंत बालमुकुंद दास जी महाराज का सोमवार की देर रात निधन हो गया। वह काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे और उनका उपचार वाराणसी के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। उनके निधन की खबर मिलते ही भागलपुर क्षेत्र के साथ ही देवरिया और आसपास के जनपदों के साधु-संतों एवं श्रद्धालुओं में शोक की लहर दौड़ गई। बालमुकुंद दास जी महाराज लंबे समय से देवरहा बाबा मंदिर आश्रम की धार्मिक परंपराओं, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक गतिविधियों से जुड़े रहे। सरल स्वभाव, संत परंपरा के प्रति समर्पण और श्रद्धालुओं के प्रति आत्मीय व्यवहार के कारण वह संत समाज और क्षेत्रीय लोगों के बीच विशेष सम्मान रखते थे। उनके निधन से केवल एक संत का देहावसान नहीं हुआ, बल्कि सनातन धर्म की उस परंपरा को भी गहरा आघात लगा है, जिसमें संत समाज पीढ़ियों से आध्यात्मिक ज्ञान, संस्कार, सेवा और धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का कार्य करता आया है। संतों का जीवन समाज को त्याग, संयम, सेवा और सदाचार का संदेश देता है। ऐसे संत के चले जाने से उनके अनुयायियों और श्रद्धालुओं के बीच एक भावनात्मक रिक्तता पैदा होना स्वाभाविक है। भागलपुर क्षेत्र में उनके निधन के बाद लोगों में मायूसी का माहौल है। आश्रम परिसर में श्रद्धालु और साधु-संत उनके जीवन और धार्मिक योगदान को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। संत समाज में भी उनके निधन को अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। पीठाधीश्वर श्याम सुंदर जी महाराज ने बताया कि बालमुकुंद दास जी महाराज का अंतिम संस्कार मंगलवार को महर्षि देवराहा बाबा आश्रम, वाराणसी के द्वारकाधीश मंदिर परिसर में सनातन धर्म की परंपराओं के अनुसार किया जाएगा। उनके अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि देने के लिए देवरिया सहित विभिन्न जनपदों से साधु-संतों के वाराणसी पहुंचने का क्रम जारी है। संतों का जाना, एक परंपरा का मौन पड़ जाना सनातन परंपरा में संतों को केवल धार्मिक व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि वे समाज के आध्यात्मिक मार्गदर्शक और संस्कारों के संवाहक माने जाते हैं। उनके सानिध्य में आने वाले लोगों को धर्म, सेवा, संयम और मानवता का संदेश मिलता है। इसलिए किसी संत का निधन उनके परिवार या आश्रम तक सीमित घटना नहीं होती, बल्कि उससे जुड़े श्रद्धालुओं और पूरे संत समाज में गहरा प्रभाव पड़ता है। बालमुकुंद दास जी महाराज का निधन भी इसी अर्थ में संत समाज और श्रद्धालुओं के लिए एक बड़ी क्षति है। उनके जाने के बाद उनकी स्मृतियां, उनके द्वारा निभाई गई धार्मिक परंपराएं और उनके विचार ही आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का माध्यम बनेंगे। संत का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो जाए, लेकिन उसकी साधना, संस्कार और समाज के प्रति दिया गया संदेश लंबे समय तक जीवित रहता है।