यूपी पंचायत चुनाव टले: ग्राम प्रधानों को 'प्रशासक' बनाने पर हाईकोर्ट सख्त,
यूपी पंचायत चुनाव टले: ग्राम प्रधानों को 'प्रशासक' बनाने पर हाईकोर्ट सख्त, योगी सरकार से मांगा जवाब! हाईकोर्ट की सख्ती: कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देने के फैसले को अदालत में चुनौती। बदली परंपरा: पहले चुनावों में देरी होने पर ADO या सरकारी अधिकारियों को बनाया जाता था प्रशासक। योगी सरकार का तर्क: राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर लिया गया फैसला; ग्रामीण विकास कार्य न रुकें। इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका: "कार्यकाल खत्म, तो अधिकार क्यों?" उत्तर प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही अगले 6 महीने या चुनाव होने तक 'प्रशासक' नियुक्त करने के योगी सरकार के फैसले का मामला अब कानूनी पचड़े में फंस गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच (जज शेखर बी सराफ और अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ) ने ओमप्रकाश प्रजापति की जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए योगी सरकार से जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। याचिकाकर्ता का तर्क: उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3)(क) के अनुसार, ग्राम प्रधान का कार्यकाल अधिकतम 5 वर्ष का ही हो सकता है। चुनाव न कराकर पुराने प्रधानों को ही प्रशासक बनाए रखना उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने जैसा है, जो कानून की मंशा के खिलाफ है। टूटी पुरानी परंपरा: पहले सरकारी अधिकारियों को मिलती थी कमान उत्तर प्रदेश में इससे पहले जब भी पंचायत चुनावों में देरी हुई, तब व्यवस्था अलग थी: साल 2000 और 2021 में जब चुनाव टाले गए थे, तब सहायक विकास अधिकारी (ADO) या खंड विकास अधिकारी (BDO) जैसे सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। इस बार योगी सरकार ने इस पुरानी परंपरा को बदलते हुए राजस्थान और मध्य प्रदेश की तर्ज पर निवर्तमान प्रधानों को ही जिम्मेदारी सौंप दी। हालांकि, नए आदेश के मुताबिक प्रधान अपने स्तर पर कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं ले सकेंगे; उसके लिए जिलाधिकारी (DM) की मंजूरी अनिवार्य होगी। आखिर क्यों टले यूपी में पंचायत चुनाव? (3 बड़े कारण) अधूरी वोटर लिस्ट: पंचायत चुनाव की वोटर लिस्ट का अंतिम प्रकाशन अभी तक नहीं हुआ है। OBC आरक्षण का पेंच: पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए एक 'ओबीसी आयोग' के गठन के प्रस्ताव को कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है। आयोग की रिपोर्ट आने और आरक्षण निर्धारण में करीब 6 महीने का समय लग सकता है। रणनीति में बदलाव: सरकार अब विधानसभा चुनावों के बाद ही पंचायत चुनाव कराने पर विचार कर रही है, जिस पर अन्य राजनीतिक दल भी सैद्धांतिक रूप से सहमत दिख रहे हैं। सरकार ने क्यों खेला 'प्रधानों' पर दांव? राजनीतिक गलियारों और जानकारों के अनुसार, सरकार के इस फैसले के पीछे सोची-समझी रणनीति है: राजनीतिक पकड़: ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रधान किसी भी राजनीतिक दल के लिए जमीनी स्तर पर सबसे मजबूत कड़ी होते हैं। चुनाव प्रचार, रैलियों में भीड़ जुटाने और बूथ मैनेजमेंट में इनकी भूमिका अहम होती है। सरकारी अधिकारी इस काम में राजनीतिक दलों के काम नहीं आ सकते। विकास कार्य न रुकें: चुनाव टलने की स्थिति में गांवों के विकास कार्य और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित न हो, इसलिए सरकार ने प्रधानों को ही कमान सौंपने का फैसला किया था, जिसे अब कोर्ट में चुनौती दे दी गई है।