*दूध में जहर पशुओं को हानिकारक इंजेक्शन देकर बढ़ाया जा रहा उत्पादन*
*दूध में जहर पशुओं को हानिकारक इंजेक्शन देकर बढ़ाया जा रहा उत्पादन* *सेहत से खिलवाड़ पर जिम्मेदार विभाग मौन क्यों?* गोरखपुर नई दिल्ली गर्मी के इस तपते मौसम में भी हर घर तक निर्बाध दूध की आपूर्ति एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।आखिर इतना दूध आ कहां से रहा है? हकीकत यह है कि जिस दूध को हम अमृत समझकर खुद पी रहे हैं और बच्चों को पिला रहे हैं, वह कई बार धीमा जहर बनकर सेहत को खोखला कर रहा है। शहरों और गांवों में दूध-दही की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए दुधारू पशुपालन को बड़े स्तर पर प्रोत्साहन दिया जा रहा है। अधिकांश राज्यों में सहकारी दुग्ध समितियां कार्यरत हैं और कई नामी कंपनियां पैकेटबंद दूध बेच रही हैं। इसके बावजूद बड़ी आबादी आज भी मुहल्ले की डेयरी या स्थानीय दूधिये पर ही भरोसा करती है।दूध में पानी, स्टार्च या डिटर्जेंट मिलाने की खबरें तो अक्सर सामने आती हैं। लेकिन इससे भी गंभीर पहलू है।अधिक दूध के लालच में गाय-भैंसों को ऑक्सीटोसिन जैसे हानिकारक इंजेक्शन और हार्मोन बढ़ाने वाली दवाएं देना। इन दवाओं से पशु का दूध उत्पादन अस्थायी रूप से बढ़ तो जाता है, पर उसके स्वास्थ्य पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार हार्मोन इंजेक्शन से पशुओं की प्रजनन क्षमता घटती है, गर्भपात का खतरा बढ़ता है और दूध देना बंद करने के बाद उन्हें असहनीय बीमारियां घेर लेती हैं। यह कृत्य न केवल पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध है, बल्कि मानव स्वास्थ्य से भी सीधा खिलवाड़ है। बच्चों को बेहतर पोषण देने की उम्मीद में अभिभावक दूध पिलाते हैं, लेकिन दवाओं से निकले दूध से हार्मोनल असंतुलन, समय से पहले यौवन, प्रतिरोधक क्षमता में कमी और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। खाद्य सुरक्षा विभाग समय-समय पर मिलावटी दूध के खिलाफ छापेमारी करता है। मगर पशुओं को प्रतिबंधित दवाएं देकर दूध में जहर घोलने के इस संगठित गोरखधंधे पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखती। पशुपालन विभाग, डेयरी विकास बोर्ड और खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण की चुप्पी सवालों के घेरे में है। डेयरियों और दूध संकलन केंद्रों पर औचक जांच और दूध के सैंपल की नियमित लैब टेस्टिंग अनिवार्य हो। ऑक्सीटोसिन की अवैध बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध और दोषियों पर पशु क्रूरता व खाद्य अपमिश्रण अधिनियम के तहत कठोर सजा। किसानों को बताना होगा कि दवाओं से बढ़ा दूध अल्पकालिक लाभ है, पर पशु की उम्र और आमदनी दोनों घटाता है।चारे की गुणवत्ता, पशु नस्ल सुधार और वैज्ञानिक प्रबंधन से दूध उत्पादन बढ़ाने को बढ़ावा दिया जाए। जब तक जिम्मेदार विभाग नींद से नहीं जागते, तब तक हर घूंट दूध के साथ हम अनजाने में बीमारी पी रहे हैं। जरूरत है कि प्रशासन दूध की शुद्धता को सिर्फ लैब रिपोर्ट नहीं, बल्कि खेत से थैली तक की पूरी चेन में सुनिश्चित करे।