महालक्ष्मी आराधना से सर्वांगीण सुख: राघव ऋषि

घघसरा गोरखपुर । नगर पंचायत घघसरा मेन मार्केट स्थित राधा कृष्ण मैरेज वाटिका में स्वर्गीय नेबूलाल अग्रहरि की पुण्यस्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठ दिवस अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वक्ता राघव ऋषि ने भक्ति और महालक्ष्मी आराधना का गूढ़ रहस्य उजागर किया। उन्होंने कहा कि गोवर्धन लीला भक्ति को बढ़ाने वाली दिव्य लीला है। मनुष्य को समय निकालकर पवित्र स्थलों पर जाकर महालक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए, तभी जीवन में सुख-समृद्धि और सुरक्षा मिलती है। विपत्ति के समय केवल प्रभु का ही सहारा सर्वोपरि है। राघव ऋषि ने रासलीला को जीव और परमात्मा के मिलन की लीला बताते हुए कहा कि जब जीव माया के आवरण से मुक्त होता है, तब उसका ब्रह्म से साक्षात्कार होता है। उन्होंने शुकदेव जी और राधा तत्व का उल्लेख करते हुए बताया कि “श्री” का अर्थ महालक्ष्मी है, जो भगवान के साथ सदैव विराजमान रहती हैं। उन्होंने कहा कि महालक्ष्मी के आठ स्वरूप हैं और चार ग्रह—बुध, बृहस्पति, शुक्र व शनि—का संचालन भी वही करती हैं। भगवान राम और कृष्ण ने भी महालक्ष्मी की आराधना की, जिससे सिद्ध होता है कि जीवन में समृद्धि हेतु यह आराधना अनिवार्य है। कथा के दौरान भजन “झूला झूलो रे सांवरा” पर श्रद्धालु झूम उठे। ऋषि जी ने बताया कि रासलीला काम विजय की लीला है और गोपियों का प्रेम निष्काम भक्ति का प्रतीक है। अक्रूर प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि जो क्रूरता छोड़कर सरलता अपनाता है, वही भगवान को प्राप्त करता है। उन्होंने कंस वध प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान ने अत्याचार का अंत कर धर्म की स्थापना की और उग्रसेन को राज्य सौंपा। रुक्मिणी-कृष्ण विवाह का दिव्य संदेश राघव ऋषि ने रुक्मिणी विवाह को लक्ष्मीनारायण मिलन बताते हुए कहा कि सच्चे समर्पण से ही भगवान की प्राप्ति होती है। जीव यदि महालक्ष्मी को माँ के रूप में पूजेगा तो कृपा अवश्य मिलेगी, लेकिन लक्ष्मीपति बनने का अहंकार पतन का कारण बनता है। प्रातःकाल ऋषि जी द्वारा निःशुल्क ज्योतिष परामर्श भी दिया गया। मुख्य यजमान श्रीमती सुभावती देवी सहित अनेक श्रद्धालुओं ने व्यास पूजन एवं आरती में भाग लिया। संयोजक अशोक अग्रहरि ने बताया कि गुरुवार की कथा में सुदामा और भगवान श्रीकृष्ण के मिलन का भावपूर्ण प्रसंग सुनाया जाएगा।