गन्ने की विलुप्तता ने खत्म कर दी गांव की मिठास। मदरिया ।

गन्ने की विलुप्तता ने खत्म कर दी गांव की मिठास। मदरिया । कभी गांवों की पहचान रहा गन्ना आज धीरे-धीरे खेतों से गायब होता जा रहा है। एक समय था जब हर दूसरे खेत में लहलहाती गन्ने की फसल, घर-घर गुड़ की खुशबू और कोल्हुओं की आवाज़ गांव की मिठास को जीवंत रखती थी। लेकिन बदलते समय, बढ़ती लागत और नीतिगत उपेक्षा ने गन्ने की खेती को लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया है। किसानों का कहना है कि खाद, बीज और सिंचाई की बढ़ती लागत के मुकाबले गन्ने का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा। मिलों से भुगतान में देरी और वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ता रुझान भी गन्ने की खेती छोड़ने की बड़ी वजह बना है। नतीजतन, जहां पहले गुड़ और खांडसारी का उत्पादन होता था, वहां अब सन्नाटा पसरा है। गन्ने की कमी का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहा। इससे जुड़े कारीगर, कोल्हू चलाने वाले और मजदूरों की आजीविका भी प्रभावित हुई है। गांवों की पारंपरिक मिठास—गुड़ की रोटी, तिल-गुड़ के लड्डू—अब यादों तक सिमट गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते उचित समर्थन मूल्य, समय पर भुगतान और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराई जाए, तो गन्ने की खेती को फिर से संजीवनी मिल सकती है। वरना गांवों से मिठास का यह प्रतीक हमेशा के लिए खो सकता है। मदरिया , नरहन आदि जगहों के किसानों ने बताया कि समय पर सही मार्गदर्शन न मिल पाना , बीज की कमी, आवारा पशुओं का आतंक ये सभी कारण है कि कोई भी किसान गन्ना की बोवाई का जोखिम नहीं उठाता है , अगर सरकार की तरफ से उपरोक्त की समुचित व्यवस्था हो जाय तो गन्ना किसानों की मुख्य आय का श्रोत बन सकता है ।