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Pradhan Pravasi
Gorakhpur२४ मिनट पहले

*सड़क सुरक्षा बैठक में स्कूली वाहनों की फिटनेस पर उठे सवाल, 304

*सड़क सुरक्षा बैठक में स्कूली वाहनों की फिटनेस पर उठे सवाल, 304

*सड़क सुरक्षा बैठक में स्कूली वाहनों की फिटनेस पर उठे सवाल, 304 फेल वाहनों में 108 को फिर मिला प्रमाणपत्र* *मंडलायुक्त इंद्र विक्रम सिंह ने पूछा—फिटनेस में फेल वाहन से हादसा हुआ तो जिम्मेदार कौन?* *196 स्कूली वाहनों का पंजीयन निरस्त, ब्लैक स्पॉट से लेकर गंभीर सड़क दुर्घटनाओं और यातायात नियमों के उल्लंघन पर भी हुई चर्चा* गोरखपुर। मंडलीय सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में स्कूली वाहनों की फिटनेस में मिली कमियों का मुद्दा छाया रहा। बच्चों की सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर मामले पर मंडलायुक्त इंद्र विक्रम सिंह ने परिवहन विभाग की जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए। बैठक में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, फिटनेस जांच में फेल हुए 304 स्कूली वाहनों में से 108 को दोबारा फिटनेस प्रमाणपत्र जारी किया गया, जबकि 196 वाहनों का पंजीयन निरस्त कर दिया गया। मंडलायुक्त ने सवाल उठाया कि यांत्रिक खामियों के कारण फिटनेस जांच में फेल वाहन यदि सड़क पर चलते हुए पाए जाते हैं और उनसे दुर्घटना हो जाती है, तो जिम्मेदार कौन होगा? ऐसे वाहनों को सीज क्यों नहीं किया गया? उन्होंने स्कूली बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ मंडल के अन्य जनपदों में भी वाहनों की स्थिति की समीक्षा करने और नियमों का कड़ाई से पालन कराने पर जोर दिया। बैठक में डीआईजी रेंज एस. चन्नप्पा समेत विभिन्न विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। स्कूली वाहनों की फिटनेस का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन वाहनों से प्रतिदिन बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल आते-जाते हैं। ब्रेक, टायर, स्टीयरिंग, लाइट और अन्य जरूरी यांत्रिक हिस्सों में खराबी दुर्घटना की वजह बन सकती है। मंडलायुक्त ने सवाल उठाया कि जब किसी वाहन को तकनीकी खामियों के कारण फिटनेस जांच में पास नहीं किया गया, तो उसे सड़क पर चलने से रोकने के लिए क्या कार्रवाई की गई? यदि ऐसा वाहन बच्चों को लेकर चलता है और हादसा हो जाता है, तो जवाबदेही किसकी तय होगी? उन्होंने यह भी सवाल किया कि ऐसे वाहनों को सीज करने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई। अभिभावकों को अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता रहती है, इसलिए परिवहन विभाग और स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि बच्चों को ले जाने वाले वाहन निर्धारित सुरक्षा मानकों पर खरे उतरें। बैठक में पिछली बैठक में लिए गए निर्णयों के सापेक्ष की गई कार्रवाई की समीक्षा भी की गई। अधिकारियों से अपेक्षा की गई कि जिन बिंदुओं पर सुधार के निर्देश दिए गए थे, उन पर हुई प्रगति का आकलन किया जाए और लंबित कार्यों को समयबद्ध ढंग से पूरा कराया जाए। सड़क सुरक्षा से जुड़े मामलों में केवल निर्देश देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके अनुपालन की निगरानी और जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है। सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए दुर्घटना संभावित स्थानों यानी ब्लैक स्पॉट की स्थिति पर भी चर्चा हुई। ऐसे स्थानों पर सड़क की बनावट, तीखे मोड़, संकेतकों की कमी, प्रकाश व्यवस्था और वाहनों की गति जैसे कारणों का आकलन कर सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। जहां बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं, वहां सड़क सुरक्षा के जरूरी इंतजाम किए जाने चाहिए। संकेतक, रिफ्लेक्टर, गति नियंत्रण के उपाय और सड़क इंजीनियरिंग में सुधार से दुर्घटनाओं की आशंका कम की जा सकती है। सड़क दुर्घटनाओं के अद्यतन तुलनात्मक आंकड़ों की समीक्षा भी की गई। दुर्घटनाओं, घायलों और मृतकों की संख्या के आधार पर यह पता लगाने में मदद मिलती है कि किन मार्गों और क्षेत्रों में हादसों का खतरा अधिक है। तीन या उससे अधिक लोगों की मृत्यु वाली सड़क दुर्घटनाओं की संबंधित विभागों के नामित प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त जांच और जांच रिपोर्ट की समीक्षा भी महत्वपूर्ण है। ऐसी जांच से दुर्घटना के कारणों, सड़क की स्थिति, वाहन की तकनीकी खराबी और अन्य संभावित पहलुओं की पहचान कर भविष्य में हादसों को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। यातायात व्यवस्था को सुरक्षित बनाने के लिए वाहनों की गति नियंत्रित करने वाले उपायों पर भी ध्यान दिया गया। स्कूलों, बाजारों, चौराहों और घनी आबादी वाले इलाकों में निर्धारित मानकों के अनुसार गति नियंत्रण के उपाय, संकेतक और पैदल यात्रियों की सुरक्षा के इंतजाम जरूरी हैं। वाहन चालकों को निर्धारित गति सीमा का पालन करना चाहिए, क्योंकि तेज रफ्तार दुर्घटनाओं में जनहानि का बड़ा कारण बन सकती है। यातायात नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई और परिवहन विभाग की ओर से ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित करने की प्रक्रिया की भी समीक्षा हुई। तेज गति से वाहन चलाने, गलत दिशा में वाहन ले जाने, हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल नहीं करने, ओवरलोडिंग तथा अन्य यातायात नियमों के उल्लंघन पर नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है। बार-बार नियम तोड़ने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई से सड़क पर अनुशासन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इंटीग्रेटेड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (आईटीएमएस) वाले शहरों, एक्सप्रेस-वे और अन्य मार्गों पर लगाए गए इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन उपकरणों से की गई कार्रवाई पर भी चर्चा हुई। कैमरों और अन्य तकनीकी साधनों से यातायात नियमों का उल्लंघन पकड़ने, चालान जारी करने और कार्रवाई की निगरानी करने से व्यवस्था को प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके लिए उपकरणों का सुचारू संचालन और चालान संबंधी प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करना आवश्यक है। सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। वाहन चालकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और आम नागरिकों को यातायात नियमों की जानकारी देने के लिए जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है। हेलमेट, सीट बेल्ट, निर्धारित गति सीमा और वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करने जैसे नियमों का पालन करके दुर्घटनाओं के जोखिम को कम किया जा सकता है। दुर्घटना होने के बाद घायलों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना भी सड़क सुरक्षा का अहम हिस्सा है। एंबुलेंस सेवाओं, अस्पतालों और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र के बीच समन्वय मजबूत होने से घायलों को समय पर उपचार मिल सकता है। दुर्घटना संभावित स्थानों की पहचान, सड़क सुरक्षा उपायों में सुधार और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करना जनहानि कम करने के लिए जरूरी है। जीरो फैटेलिटी डिस्ट्रिक्ट (जेडएफडी) कार्यक्रम के तहत सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को रोकने के प्रयासों पर भी ध्यान दिया गया। इसके लिए दुर्घटना संभावित स्थानों पर सुधार, यातायात नियमों का कड़ाई से पालन, प्रभावी प्रवर्तन और दुर्घटना के बाद त्वरित चिकित्सा सहायता जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं। विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय से सड़क हादसों में होने वाली मौतों को कम करने की दिशा में प्रभावी काम किया जा सकता है। मंडलीय सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में मंडलायुक्त इंद्र विक्रम सिंह ने स्कूली वाहनों की फिटनेस में मिली कमियों को गंभीरता से लेते हुए जवाबदेही और प्रभावी निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया। बैठक में डीआईजी रेंज एस. चन्नप्पा सहित संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। सड़क सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए असुरक्षित वाहनों के संचालन पर रोक, ब्लैक स्पॉट का सुधार, गंभीर दुर्घटनाओं की जांच, यातायात नियमों का पालन और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को प्रभावी बनाना जरूरी है।

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