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Balram Singh
Fatehpur१३ दिन पहले

'ठंड' में 'डंडे' खा रहे 'आवारा' 'बेजुबान'

'ठंड' में 'डंडे' खा रहे 'आवारा' 'बेजुबान'

'ठंड' में 'डंडे' खा रहे 'आवारा' 'बेजुबान' गौ-आश्रय स्थलों में इन्हें पहुंचाने कि नहीं उठाई जा रही जहमत! भूख मिटाने को कूड़ा कचरा के ढ़ेर में ढूंढ रहे निवाला! झुंड में घूम रहे गौवंश दुर्घटनाओं का भी बन रहे कारण! 63 गौशालाओं में 12621संरक्षित हैं गौवंश! नगरपालिका व विकास खंडों के कैटल कैचर बने शो-पीस! बड़ी संख्या में ईयर टैगिंग वाले गौवंश भी सड़कों पर घूम रहे! चौंकाने वाली हैं गौशालाओं की व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत! आखिर किसके है आवारा गौवंश,तस्करों के हत्थे चढ़ कटने को भी होते मजबूर! दावे लाख किए जा रहे हों लेकिन हकीकत में तो बेसहारा गौवंशों की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है।गौ-आश्रय स्थलों में संरक्षण की बात करने वाले अधिकारियों को सड़कों पर घूम रहे आवारा बेजुबान नजर नहीं आते।भीषण कड़ाके की ठंड में लोगों के डंडे एवं कूड़ा कचरा खाना इनकी आदत में शुमार हो गया है। सवाल ये भी बड़ा है कि आखिर ये गौवंश हैं किसके लेकिन जिस तरह से गांवों से लेकर शहर तक इन आवरा बेजुबानों को देखा जा सकता है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी दावों की जमीनी हकीकत कुछ और ही है। वैसे तो फतेहपुर जिले में गौवंशों को संरक्षित करने के लिए 63 गौ-आश्रय स्थलों को बनाया गया है यहां मौजूदा समय में 12621गौवंश संरक्षित हैं।सहभागिता योजना के तहत 2005 गौवंशों को दिया गया है।इसके बावजूद सड़कों पर हर समय आवारगी करते गौवंशों को देखा जा सकता है। दुरुस्त व्यवस्थाओं के दावे कुछ भी किए जा रहे हों लेकिन हकीकत तो गौशालाओं की कुछ और ही है।गिनी चुनी गौशालाएं ही ऐसी हैं जहां अफसरों के चक्कर लगते रहते हैं।वहां की व्यवस्थाएं दुरुस्त रखने की कोशिश रहती हैं पर निर्धारित मानक में गौवंशों का भरण पोषण हो रहा है कि नहीं इसकी हकीकत गौ-आश्रय स्थल में जाने के बाद सामने आ जाती है।सवाल यह भी है कि बढ़ी महंगाई में ₹50 प्रति गौवंश के हिसाब से दी जाने वाली धनराशि क्या पर्याप्त है? जिस तरह से गौवंश गांवों से लेकर कस्बों की सड़कों पर खुलेआम छुट्टा घूम रहे हैं।उससे उन दावों की भी पोल खुल कर सामने आ रही है कि इन गौवंशों को पकड़ा कर आश्रय स्थलों में भेजने को अधिकारी संवेदनशील हैं। जिले के 13विकास खंडों सहित नगरपालिका परिषद फतेहपुर,खागा में कैटल कैचर खड़े तो हैं लेकिन इनके पहियों को घुमानें की जहमत करे तो कौन करे? इसी का नतीजा है कि बेजुबान सड़कों पर आवारा घूम कूड़ा कचरा खा लोगों के डंडे खा रहे हैं। झुंड में घूमने वाले ये गौवंश दुर्घटनाओं का भी बड़ा कारण बन रहे हैं। आवारा घूमने वाले बेजुबान कई तो ऐसे हैं जो गौशालाओं की ईयर टैगिंग लगाए हैं।अगर इन्हें गौशाला में रखा गया है तो फिर वो बाहर कैसे हैं?अगर वो बाहर नहीं हैं तो जो घूम रहे हैं फिर वह किसके हैं?जिम्मेदारी जितनी सरकार एवं प्रशासन की है उससे कहीं जिम्मेदारी गौपालकों की भी है जो इनका उपयोग करने के बाद छुट्टा छोड़ रहे हैं। गौवंशों के छुट्टा घूमने से इन पर निगाहें तस्करों की रहती हैं जिसका नतीजा है कि जिले में कहीं न कहीं से गौवांशों के काटे जाने की सूचनाएं आती रहती हैं। गौवंशों के संरक्षण,सुरक्षा,स्वास्थ्य,व्यवस्थाओं को लेकर जिम्मेदारों ने कागजी खानापूरी कर अपना पल्ला झाड़ लिया है जबकि सतही हकीकत में इनकी दुर्गति व दुर्दशा देखते ही बनती है।

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